*अपने धर्म शास्त्रों और इतिहास से सीख लेकर लेना होगा कठोर निर्णय।*
"इतिहास से शिक्षा ली जाती है, परन्तु निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर लेना पड़ता है .... !
हर युग अपने तर्कों और अपनी आवश्यकता के आधार पर अपना नायक चुनता है .... !!
राम त्रेता युग के नायक थे , श्री कृष्ण के भाग में द्वापर आया था .... !
मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और श्री कृष्ण का निर्णय एक सा नहीं हो सकता !!
प्रभु श्री राम और श्री कृष्ण की परिस्थितियों में बहुत अंतर है ।
राम के युग में खलनायक भी ' रावण ' जैसा शिवभक्त होता था .... !!
तब रावण जैसी नकारात्मक शक्ति के परिवार में भी विभीषण जैसे सन्त हुआ करते थे ..... ! तब बाली जैसे खलनायक के परिवार में भी तारा जैसी विदुषी स्त्रियाँ और अंगद जैसे सज्जन पुत्र होते थे .... ! उस युग में खलनायक भी धर्म का ज्ञान रखता था .... !!
इसलिए राम ने उनके साथ कहीं छल नहीं किया .... ! किंतु श्री कृष्ण के युग में उनके भाग में में कंस , जरासन्ध , दुर्योधन , दुःशासन , शकुनी , जयद्रथ जैसे घोर पापी आये थे .... !! उनकी समाप्ति के लिए हर छल उचित था .... ! पाप का अंत आवश्यक है , वह चाहे जिस विधि से हो .... !!
कलयुग (वर्तमान समय) तो इससे भी अधिक नकारात्मक हो गया है ! कलियुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा .... ! वहाँ मनुष्य को कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा .... नहीं तो धर्म समाप्त हो जाएगा .... !
जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ सत्य एवं धर्म का समूल नाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता अर्थहीन हो जाती है .... !
तब महत्वपूर्ण होती है "विजय" , केवल "विजय" .... !
*वर्तमान को यह सीखना ही होगा ..... !!*
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या धर्म का भी नाश हो सकता है .... ? और यदि धर्म का नाश होना ही है , तो क्या मनुष्य इसे रोक सकता है ..... ?
मेरे विचार से "सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ कर बैठना मूर्खता होती है ! ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता ..... !केवल मार्ग दर्शन करता है।
सब मनुष्य को ही स्वयं करना पड़ता है .... ! श्री कृष्ण को हम ईश्वर मानते हैं न .... !
तो बताइए श्री कृष्ण ने स्वयं इस युद्घ में कुछ किया क्या ..... ?
सब पांडवों को ही करना पड़ा न .... ?
यही प्रकृति का संविधान है .... !
"जब अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ सत्य और धर्म का विनाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है ....।।"
*वर्तमान समय में बढ रही अनैतिकता और मातृ शक्तियों के साथ बढ रही दुराचार की घटनाओं पर इतिहास से सीख लेते हुए कठोरतम् कदम उठाने की आवश्यकता है। वर्तमान समय में बढ रही दुराचारी आतातायी शक्तियों को कुचला नहीं गया तो आने वाला कम बहुत ही भयावह होगा।*
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राम राज्य का समपना संजोये और आम जनमानस को राम राज्य का सपना दिखाने वाले हमारे माननीय राजनेता वर्तमान समय में सत्तारूढ़ हैं यदि इस समय भी हमारी मातृ शक्तियों के साथ न्याय नहीं होगा तो फिर यह कोरी कल्पना और सत्ता प्राप्ति का एक जुमला ही सिद्ध होगा ।
*यह लेख निज विचार और मन की व्यथा है, किसी व्यक्ति, समुह या दल का विरोध करना इसका उद्देश्य नहीं है।*
प्रदीप कुमार पाण्डेय
सहादतपुरा, मऊ
"इतिहास से शिक्षा ली जाती है, परन्तु निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर लेना पड़ता है .... !
हर युग अपने तर्कों और अपनी आवश्यकता के आधार पर अपना नायक चुनता है .... !!
राम त्रेता युग के नायक थे , श्री कृष्ण के भाग में द्वापर आया था .... !
मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और श्री कृष्ण का निर्णय एक सा नहीं हो सकता !!
प्रभु श्री राम और श्री कृष्ण की परिस्थितियों में बहुत अंतर है ।
राम के युग में खलनायक भी ' रावण ' जैसा शिवभक्त होता था .... !!
तब रावण जैसी नकारात्मक शक्ति के परिवार में भी विभीषण जैसे सन्त हुआ करते थे ..... ! तब बाली जैसे खलनायक के परिवार में भी तारा जैसी विदुषी स्त्रियाँ और अंगद जैसे सज्जन पुत्र होते थे .... ! उस युग में खलनायक भी धर्म का ज्ञान रखता था .... !!
इसलिए राम ने उनके साथ कहीं छल नहीं किया .... ! किंतु श्री कृष्ण के युग में उनके भाग में में कंस , जरासन्ध , दुर्योधन , दुःशासन , शकुनी , जयद्रथ जैसे घोर पापी आये थे .... !! उनकी समाप्ति के लिए हर छल उचित था .... ! पाप का अंत आवश्यक है , वह चाहे जिस विधि से हो .... !!
कलयुग (वर्तमान समय) तो इससे भी अधिक नकारात्मक हो गया है ! कलियुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा .... ! वहाँ मनुष्य को कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा .... नहीं तो धर्म समाप्त हो जाएगा .... !
जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ सत्य एवं धर्म का समूल नाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता अर्थहीन हो जाती है .... !
तब महत्वपूर्ण होती है "विजय" , केवल "विजय" .... !
*वर्तमान को यह सीखना ही होगा ..... !!*
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या धर्म का भी नाश हो सकता है .... ? और यदि धर्म का नाश होना ही है , तो क्या मनुष्य इसे रोक सकता है ..... ?
मेरे विचार से "सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ कर बैठना मूर्खता होती है ! ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता ..... !केवल मार्ग दर्शन करता है।
सब मनुष्य को ही स्वयं करना पड़ता है .... ! श्री कृष्ण को हम ईश्वर मानते हैं न .... !
तो बताइए श्री कृष्ण ने स्वयं इस युद्घ में कुछ किया क्या ..... ?
सब पांडवों को ही करना पड़ा न .... ?
यही प्रकृति का संविधान है .... !
"जब अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ सत्य और धर्म का विनाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है ....।।"
*वर्तमान समय में बढ रही अनैतिकता और मातृ शक्तियों के साथ बढ रही दुराचार की घटनाओं पर इतिहास से सीख लेते हुए कठोरतम् कदम उठाने की आवश्यकता है। वर्तमान समय में बढ रही दुराचारी आतातायी शक्तियों को कुचला नहीं गया तो आने वाला कम बहुत ही भयावह होगा।*
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राम राज्य का समपना संजोये और आम जनमानस को राम राज्य का सपना दिखाने वाले हमारे माननीय राजनेता वर्तमान समय में सत्तारूढ़ हैं यदि इस समय भी हमारी मातृ शक्तियों के साथ न्याय नहीं होगा तो फिर यह कोरी कल्पना और सत्ता प्राप्ति का एक जुमला ही सिद्ध होगा ।
*यह लेख निज विचार और मन की व्यथा है, किसी व्यक्ति, समुह या दल का विरोध करना इसका उद्देश्य नहीं है।*
प्रदीप कुमार पाण्डेय
सहादतपुरा, मऊ

