टैरिफ कटौती: ‘मुक्त व्यापार’ नहीं, भारत की कृषि और संप्रभुता पर सुनियोजित हमला भारत से अधिक अमेरिका का हित- निसार अहमद




भारत–अमेरिका व्यापार संबंधों में जब भी टैरिफ कटौती की बात आती है, उसे बड़े सलीके से मुक्त व्यापार, रणनीतिक साझेदारी और वैश्विक सहयोग जैसे आकर्षक शब्दों में पेश किया जाता है। लेकिन इन शब्दों की चमक के पीछे जो यथार्थ छिपा है, वह बेहद असहज करने वाला है। सच्चाई यह है कि टैरिफ कटौती भारत के आर्थिक या सामाजिक हितों से अधिक अमेरिकी कॉरपोरेट और साम्राज्यवादी हितों की पूर्ति का साधन है। और इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बड़ा शिकार भारत का कृषि क्षेत्र बनने वाला है।
अमेरिका दुनिया की उन अर्थव्यवस्थाओं में है जहाँ खेती किसान नहीं, बल्कि विशाल एग्री-बिज़नेस कॉरपोरेशन चलाते हैं। वहाँ की सरकार अरबों डॉलर की सब्सिडी देकर अपने कृषि उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कृत्रिम रूप से सस्ता बनाती है। यही वजह है कि अमेरिकी गेहूं, मक्का, सोयाबीन, डेयरी उत्पाद और प्रोसेस्ड फूड वैश्विक बाज़ार में पहले से ही असमान प्रतिस्पर्धा के साथ उतरते हैं। यदि भारत ऐसे में टैरिफ घटाता है, तो इसका सीधा अर्थ है कि सब्सिडी से लैस अमेरिकी उत्पाद भारतीय मंडियों में बाढ़ की तरह घुसेंगे। सवाल यह नहीं है कि उपभोक्ता को सस्ता माल मिलेगा या नहीं; बल्कि सवाल यह है कि बिना सब्सिडी, छोटे जोत वाले भारतीय किसान उस मुकाबले में टिकेंगे कैसे?
टैरिफ कटौती का असर केवल आयात–निर्यात के आँकड़ों तक सीमित नहीं रहता। इसका सीधा असर खेत, गांव और किसान की जेब पर पड़ता है। सस्ते आयात के कारण भारतीय कृषि उत्पादों के दाम गिरते हैं, दाम गिरते हैं तो किसान की आय घटती है, और आय घटते ही कर्ज़, पलायन और सामाजिक संकट गहराता है। दूध, दाल, तिलहन, मक्का और सोयाबीन जैसे क्षेत्र पहले से ही अस्थिर हैं। इन्हीं क्षेत्रों में अमेरिकी एग्री-कार्टेल वर्षों से भारत पर बाज़ार खोलने का दबाव बना रहे हैं। टैरिफ कटौती उनके लिए आर्थिक सुधार नहीं, बल्कि रणनीतिक विजय है।
विडंबना यह है कि भारत में जो राजनीतिक शक्तियाँ मंचों से किसान हितैषी होने का दावा करती हैं, वही अंतरराष्ट्रीय समझौतों की मेज़ पर किसान को सबसे सस्ता सौदा मान लेती हैं। भारत की आधी से ज़्यादा आबादी आज भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है, जबकि अमेरिका में यह संख्या दो प्रतिशत से भी कम है। इसके बावजूद दोनों देशों की कृषि को एक ही पैमाने से तौलकर टैरिफ घटाने की बात करना न तो तर्कसंगत है, न ही ईमानदार रणनीति। यह सीधा-सीधा राजनीतिक पाखंड है।
टैरिफ को केवल कर के रूप में देखना भी एक बड़ी भूल है। टैरिफ दरअसल घरेलू उत्पादन और राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता की सुरक्षा का एक औज़ार है। टैरिफ घटते हैं तो सरकार का राजस्व घटता है, घरेलू उद्योग कमजोर पड़ते हैं और आयात पर निर्भरता बढ़ती है। यही वह रास्ता है, जिसने अतीत में भारत को उपनिवेशकालीन अर्थव्यवस्था में बदल दिया था जहाँ हम कच्चा माल और उपभोक्ता बाज़ार देते थे, और मुनाफ़ा विदेशी ताक़तें ले जाती थीं।
आज टैरिफ कटौती को क्वाड, रक्षा सौदों और रणनीतिक साझेदारी के आवरण में पेश किया जा रहा है, ताकि असहमति की हर आवाज़ को राष्ट्रविरोधी ठहराया जा सके। लेकिन रणनीतिक साझेदारी का अर्थ आर्थिक आत्मसमर्पण नहीं होता। यदि हर समझौते में भारत ही रियायत दे और अमेरिका ही लाभ उठाए, तो यह साझेदारी नहीं, बल्कि अधीनता की ओर बढ़ता कदम है।
यदि बिना ठोस सुरक्षा उपायों, बिना सब्सिडी संतुलन और बिना भारतीय कृषि को मजबूत किए टैरिफ कटौती की गई, तो यह सुधार नहीं कहलाएगा। यह भारत के किसान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सुनियोजित हमला होगा। भारत को व्यापार चाहिए, लेकिन अपने किसान की बलि देकर नहीं। भारत को वैश्विक भूमिका चाहिए, लेकिन अपने गांव और खेत को दांव पर रखकर नहीं। जो लोग टैरिफ कटौती को सर्वगुणसंपन्न समाधान की तरह पेश कर रहे हैं, वे या तो अमेरिकी कॉरपोरेट हितों के प्रवक्ता हैं या फिर जानबूझकर भारत के किसान की सच्चाई से आँखें मूंदे हुए।