रतनपुरा -जन्मजात दिव्यांग अनवर नट को नहीं मिलती सरकारी सहायता

(मऊ) अनवर नट एक ऐसा मजबूर शख्स है ,जिसे जन्मजात आंशिक दिव्यांगता मिली ,बाद में अपने जर्जर झोपड़ी में बारिश के दिनों में पांव फिसल जाने के कारण वह पूर्ण रूप से दिव्यांग हो गया। सरकारी सहायता से पूरी तरह से मरहूम है अनवर नट।
अनवर नट पुत्र विजय नट उम्र 20 वर्ष रतनपुरा प्रखंड के बिलौझा ग्राम पंचायत का निवासी है। चूकि बचपन से ही वह दिव्यांग है ।इसलिए जब उसने होश संभाला तो परंपरागत रूप से गांव में घूम घूम कर अपने जमात के साथ भीख मांगना उसका शगल था। इन 20 वर्षों के दरमियान उसे पता ही नहीं चला कि उसका बचपन कैसे और कब बीत गया। जब उसने होश संभाला तो अपने पिता के साथ घूमता था, क्योंकि पढ़ाई का उसे शौक नहीं रहा तथा घर वालों ने उसे स्कूल भी नहीं भेजा। उसके पिता डीजे विजयी नट खानाबदोशों की भांति अड्डा बदल बदल कर के बंदरिया का नाच दिखा करके अपना और अपने परिवार का पेट पालते थे। लेकिन अपना ही बंदर खोटा निकला, जिस बंदर को नचा नचा करके वे दो पैसा कमाते थे, और उसे भी पालते पोशते और खिलाते थे, उसी बंदर ने उन्हें कई बार काट लिया। जिससे परेशान होकर के विजई नट ने कटहा बंदर को बलिया जनपद के नगरा थाना अंतर्गत मलप हरसेनपुर गांव में ले जाकर के छोड़ दिया। बंदर ने जब साथ छोड़ा तो विजई नट और उसके पुत्र अनवर नटको खाने कमाने की कठिनाई सामने आ आ गई,तो उसने मधुमक्खियों के छत्ते से मधु (शहद) निकालने का काम शुरू कर दिया। जिससे पारिवारिक गाड़ी चलने लगी ,इसी बीच अनवर नट भी अब किशोरावस्था में कदम रख लिया था, और वह भी अपने पारंपरिक काम मंगन के रूप में रोज कुछ न कुछ कमा लेता था। जिससे परिवार के खर्चे चलने लगे। इसी बीच बीते बरसात के दिनों मेंउसके जर्जर झोपड़ी में पानी लग गया लगा, जब लघुशंका के लिए अनवर नट उठा तो फिसल कर के गिर पड़ा। जिससे उसकी कमर टूट गई। धनाभाव के चलते उसका इलाज नहीं हो पाया जिसकी वजह से उसकी कमर टेढ़ी हो गई। दिव्यांगजनों को मिलने वाले संसाधन भी उसे नसीब नहीं हो पाए । जिसकी वजह से उसने बांस के फट्ठा से एक जोड़ी अस्थाई वैशाखी बना ली ,और उसी के सहारे वह घूम घूम कर भीख मांगता है।इसके परिवार के पास अंतोदय कार्ड है ,परंतु अभी तक इस परिवार ने आयुष्मान कार्ड नहीं बनवा पाया है, अगर आयुष्मान कार्ड बन जाता तो अनवर नटका बेहतर ढंग से इलाज हो जाता।
दिव्यांगजनों को सहायता देने वाली संस्थाओं की भी नजर इसके ऊपर नहीं पड़ी है। जिसकी वजह से न तो उसे वैशाखी ना ही ट्राई रिक्शा ही मिल पाया है। आज तक उसे दिव्यांग सर्टिफिकेट भी उपलब्ध नहीं हो पाया है। जिससे वह बसों में चलता तो है परंतु दया भाव में परिचालक उससे टिकट बनवाने को नहीं कहते।
दिव्यांग अनवर नट का कहना है कि उसे सबसे पहले एक जोड़ी वैसाखी की की आवश्यकता है, इसके बाद आयुष्मान कार्ड ,दिव्यांग सर्टिफिकेट तथा आवास की सुविधा मिल जाती तो वह किसी पर बोझ नहीं बनता।हालांकि कुछ लोगों को उसको सोमवार को जनपद में लगने वाले दिव्यांगता जांच शिविर में जाकर दिव्यांगता प्रमाणपत्र बनवाने की सलाह दिया है।                          साभार-- फतेहबहादुर गुप्त रतनपुरा