गुरु पूर्णिमा और गुरु पूजा
गुरु पुर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ ।
आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि यानि कि पूर्णिमा ही गुरु पूर्णिमा के रूप जगत प्रसिद्ध है। गुरु पूर्णिमा वो अवसर है, जिसकी प्रतीक्षा दुनिया के सभी अध्यात्म प्रेमी और आत्मज्ञान के साधक बेसब्री से करते हैं। गुरु पूर्ण है, इसीलिए पूर्णिमा ही गुरु की तिथि है।
शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को 'गुरु' कहा जाता है। जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी। बल्कि सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है।
गुरू पूर्णिमा के दिन गुरु पूजा का विधान है। भारत भर में गुरू पूर्णिमा का पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है। गोवर्धन पर्वत की इस दिन लाखों श्रद्धालु परिक्रमा देते हैं । ब्रज में इसे 'मुड़िया पूनों' कहा जाता है । प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृतकृत्य होता था। आज भी इसका महत्व कम नहीं हुआ है। पारंपरिक रूप से शिक्षा देने वाले विद्यालयों में, संगीत और कला के विद्यार्थियों में आज भी यह दिन गुरू को सम्मानित करने का होता है। मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेले लगते हैं।
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर हर धर्मावलंबी अपने गुरु के प्रति श्रद्धा और आस्था प्रकट करता है। जीवन में सफलता के लिए हर व्यक्ति गुरु के रुप में श्रेष्ठ मार्गदर्शक, सलाहकार, समर्थक और गुणी व्यक्ति के संग की चाहत रखता है। इसलिए वह गुरु के रुप में किसी संत, अध्यात्मिक व्यक्तित्व या किसी कार्य विशेष में दक्ष और गुणी व्यक्ति को चुनना चाहता है, क्योंकि गुरु की महिमा ही ऐसी है कि ईश्वर की तरह गुरु हर जगह उपस्थित है। केवल चाहत और दृष्टि चाहिए गुरु को पाने और देखने की।
यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी। इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है।
गुरु के आशीर्वाद से ही विद्यार्थी को विद्या आती है। उसके हृदय का अज्ञानता का अन्धकार दूर होता है। गुरु का आशीर्वाद ही प्राणी मात्र के लिए कल्याणकारी, ज्ञानवर्धक और मंगल करने वाला होता है। संसार की संपूर्ण विद्याएं गुरु की कृपा से ही प्राप्त होती हैं और गुरु के आशीर्वाद से ही दी हुई विद्या सिद्ध और सफल होती है। इस पर्व को श्रद्धापूर्वक मनाना चाहिए, अंधविश्वासों के आधार पर नहीं।
एक बात और बड़ी महत्वपूर्ण हमारे समझने योग्य है कि आज के कलयुग में गुरु को तो सब मानते हैं, पर गुरु की कोई नहीं मानता | सब यही सोच कर खुश हो जाते हैं कि यदि हमने गुरुदेव के चरण पकड़ लिए, उनका आश्रय ले लिया तो हमारे ऊपर गुरु की कृपा हो गयी, परन्तु ऐसा नहीं होता । यदि कृपा होनी हो तो केवल आंख के इशारे में हो जाती है और यदि नहीं होनी हो तो चाहे पूरी जिंदगी चरण पकड़ के बैठे रहिये और कृपा भी उसी पर होती है जो केवल गुरु को नहीं मानता, गुरु की भी मानता है |
🙏"गुर क्या हैं?"🙏
०१. गुरु एक तेज है, जिनके आते ही सारे संशय के अंधकार खत्म हो जाते हैं।
०२. गुरु वो मृदंग हैं, जिसके बजते ही अनाहद नाद सुनना प्रारम्भ हो जाता है।
०३. गुरु वो ज्ञान हैं, जिसके मिलते ही भय समाप्त हो जाता है।
०४. गुरु वो दीक्षा हैं, जो सही मायने में मिलती है तो भव सागर पार हो जाते हैं।
०५. गुरु वो नदी हैं, जो निरन्तर हमारे प्राणों से बहती है।
०६. गुरु वह सत् चित् आनन्द हैं, जो हमें हमारी पहचान देते हैं।
०७. गुरु वो बांसुरी हैं, जिसके बजते ही मन और शरीर आनन्द अनुभव करता है।
०८. गुरु वो अमृत हैं, जिसे पीकर कोई कभी प्यासा नहीं रहता।
०९. गुरु वो कृपा हैं, जो सिर्फ कुछ सद् शिष्यों को विशेष रुप में मिलती है और कुछ पाकर भी समझ नहीं पाते हैं।
१०. गुरु वो खजाना हैं, जो अनमोल है।
११. गुरु वो प्रसाद हैं, जिसके भाग्य में हो उसे कभी कुछ भी मांगने की जरुरत नहीं पड़ती।
गुरु पूर्णिमा का महत्व
गुरु पूर्णिमा आध्यात्मिक सम्बन्ध याद करने के लिए नियत है गुरु पूर्णिमा के दिन परमात्मा बहुत खुश होते है इस दिन हर दरवाजा भक्त के लिए खुला होता है वो जो चाहे परमेश्वर से मांग सकता है इस दिन भक्त के द्वारा लिया हुआ हर एक संकल्प पूर्ण होता है और कोई विरोध नहीं होता, इस दिन भक्त के द्वारा किया गया भजन, पाठ, आराधन, जप, ध्यान, लाखो गुना फल देता है गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व अपने गुरु का धन्यवाद करने, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए भी है कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए समर्पण एक विधि है इस दिन शिष्य अपने सद्गुरु को समर्पण के द्वारा आभार करता है समर्पण तीन तरह से कर सकते है
(१)तन का समर्पण - शारीरिक सेवा दे कर
(२) मन का समर्पण - जप ध्यान आराधन करके
(३) धन का समर्पण - अपने धन में से कुछ समर्पण करके, शास्त्र कहते है कि इस दिन शिष्य जो कुछ समर्पण करता है उसका लाखो गुना वापस पाता है जैसे अगर शारीरक सेवा द्वारा समर्पण किया जाये तो शिष्य की शारीरक स्वस्थता और सामर्थ्य बढ़ता है, मन का समर्पण करने से मन बलवान होता है,और धन का समर्पण करने से एक तो धन पवित्र होता है, और दूसरा उसमे कई गुना वृद्धि होती है, तो ये महत्वपूर्ण दिन व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए कुछ न कुछ समर्पण अवश्य करना चाहिए हमें।
