कोई तो अदृश्य दिव्य शक्ति है ! - प्रदीप कुमाए पाण्डेय


 कोई माने या न माने कोई तो दिव्य शक्ति है जो हम सबसे बड़ी है, जो हम सबसे कहीं ज्यादा समझती है और समझा सकती है । 
        हो सकता है इस खतरनाक विषाणु के भय में कोई ऐसा रहस्य, कोई ऐसा संदेश छुपा हो जिसे हम सब समझना नहीं चाहते हैं। 
         प्रकृति के इस मार नें सम्पूर्ण मानव जाति को घुटनों पर ला खड़ा किया है । 
          कोई चाँद पर कब्जे की तैयारी कर रहा है तो कोई मंगल पर, कोई सुरज को छुने की कोशिश कर रहा है तो कोई अन्तरिक्ष पा आशियां ढुढ रहा है, कोई अपने पडोसी देशों की जमीन हडपने की जुगत में है तो कोई परमाणु और पांचवीं छठवीं पीढी की हथियार बनाकर पुरे विश्व पर राज करने की कोशिश कर रहा है, कहीं धर्म, जाति, क्षेत्र के नाम पर नसंहार हो रहे हैं, तो कहीं मातृ शक्ति और मासुमों के साथ दुष्कर्म से मानवता शर्मशार हो रही है ।
         प्रकृति ने हमे रहने के लिए इतनी सुन्दर धरती दी थी और हमने इसे नर्क बना रखा है ।
          प्रकृति हमसे कुछ कहना चाह रही थी लेकिन इस चका चौंध में हमने कुछ समझने की कोशिश ही नहीं की ।
           हो सकता है यह विषाणु हमें जोडने आया हो अपनी धरा से, अपनों से, अपने आप से । शापिंग माल, सिनेमा घरों, होटलों आदि पर कुछ दिन ताले लगें तो दिल‌ के ताले स्वतः खुल जायें; हो सकता है किताब के पन्नों ‌में सुनेमा से अधिक रस मिले, बच्चों की कहानी सुनने और अपनी कहानी सुनाने का समय हमें मिला हो, सम्भव है लुडो की बाजी और कैरम की गोटियाँ हमें अपनों के पास ला दें, शायद पता चल जाय कि होटल के खाने से ज्यादा स्वाद घर के खाने में है , हो सकता है यह विषाणु हमसे कुछ कहने आया हो कुछ करवाने आया हो, विभिन्न कल कारखानों, परिवहन साधनों का कार्बन कम हो तो आकाश भी अपने फेफड़ों में आक्सीजन भर पाये ।
            कुछ दिनों के लिए ही सही, बेबस हो कर ही सही, भयभीत हो कर ही सही, हम अपनी प्रकृति से , अपनों से, अपने आप से एक बार ही सही मुलाकात तो करेंगें ।
         *इस लेख का उद्देश्य किसी की भावना को आहत करना नहीं है। घर में रहें, सुरक्षित रहें, केन्द्र व राज्य सरकार, स्वास्थ्य मंत्रालय भारत सरकार, विश्व स्वास्थ्य संगठन आदि के दिशा निर्देशों का पालन करें, कोरोना से लड़ाई लड रहे सभी कर्म वीरों का सम्मान करें सामाजिक दुरी‌ बना कर अपने आस पास जरुरतमंदों की मदद करते रहें।*