हम विचार करें और एक छोटा सा कदम बेटियों के सम्मान में उठाने का प्रयास करें ।


अभी शीघ्र ही विवाह आदि का शुभ मुहूर्त बीता है पुनः आयेगा औएर पुनरावृत्ति होती रहेगी लगभग हम सभी किसी न किसी आयोजन में सम्मिलित भी होते हैं और आयोजन की व्यवस्था, खान पान आदि पर सकारात्मक या नकारात्मक टिप्पणी भी करते हैं  लेकिन क्या कभी हमनें नकारात्मक टिप्पणी देने से पुर्व विचार किया है कि एक बेटी के माता पिता ने अपने न जाने कितनें सपनों को मारकर बच्चियों को पढाता लिखाता व काबिल बनाता है ? क्या हमनें कभी विचार किया है कि एक बाप के लिए बेटी क्या मायने रखती है?? शायद हम इस पर कभी विचार नहीं करते । क्या हमने कभी विचार करने की कोशिश की कि एक बेटी की शादी के लिए व शादी में बारातियों की आवाभगत में कोई कमी न रह जाये इसलिए लड़की के पिताजी क‌ई वर्ष से रात रात भर जागकर बिटिया की माँ के साथ योजना बनाते हैं... खाने में क्या बनेगा...रसोइया कौन होगा...पिछले क‌ई वर्षों में एक बेटी की माँ शायद नई साड़ी नही खरीदती क्योकि बेटी की शादी में कमी न रह जाये... दुनिया को दिखाने के लिए एक मध्यम परिवार की अधिकांशतः मायें अपनी बहन/ननद या भाभी की साड़ी पहन कर उस दिन काम चलाती है... पिता के चन्द रुपयों के नये कुर्ते के पीछे बनियान में सौ छेद होते हैं.... एक बेटी के माता पिता ने कितने अपने सपनों का गला दबाया होगा ।


उनकी बस एक ही इच्छा होती है कि मेरी बेटी की शादी में कोई कमी न रह जाये..... लेकिन हममे से किसी को रोटी ठंडी लगती है!!! किसी को पनीर गड़बड़ लगती है तो किसी को मिठाई में रस नहीं मिलता..।
यह कमियां निकाल कर हम एक पिता के अभिमान को ठेस पहुंचाने का काम करते हैं।
इन छोटी छोटी बातों पर शायद हम कभी गौर नहीं करते, लेकिन 'यह छोटी सी बात नहीं होती है । हमें...बेटी के पिता की इज्जत  नहीं दिखाई देती... रोटी क्या बेटी का पिता बनाता है! मीठा ... पनीर यह सब हलवाई का कार्य है... एक बेटी का पिता दिल खोलकर व हैसियत से बढ़कर खर्च करता है, कुछ कमी रह भी जाती है तो वह भी हलवाई की तरफ से... एक पिता तो अपने दिल का टुकड़ा अपनी गुड़िया रानी को विदा करता है । लडकी के माता पिता न जाने कितनी रात रोयेंगे, क्या हमनें  सोचा है?? शायद यह अन्दाजा भी नहीं लगा सकते... जो माँ कभी बेटी के बिना घर से बाहर नहीं निकलती... कल से वह बाज़ार अकेली जाएगी... जा पाएगी? जो लोग पत्नी या बहू लेने आते हैं वह खाने में कमियां निकालते हैं...
बेटी की परवरिश में माता पिता यथासम्भव कोई कमी माता पिता नहीं रखते , यह बात हमारे समझ में नहीं आती !! हमॆं कोई अपनी बेटी देता है... लेकिन हम बेटी की अहमियत नहीं देखते...



बेटी अपने पीछे छोड़ जाती है आंसुओं से भीगी अपने माँ पिताजी और रिश्तेदारों की आंखें, अपने पिता का वह आँगन जिस में कल तक वह चहकती थी.. विदाई के पल से इस आँगन की चिड़िया उड़ जाती है किसी दूर प्रदेश में.. और किसी पेड़ पर अपना घरौंदा बनाएगी।
बेटा तो एक ही कुल को चलाता है पर बेटियां दो कुल चलाती हैं ।
बेटी को 'पराया धन' की संज्ञा देना मेरे विचार से शायद गलत है। बेटी माँ बाप का अभिमान व अनमोल धन होती है, पराया धन नहीं। कभी हम शादी में जाये तो ध्यान रखें कि पनीर की सब्ज़ी बनाने में एक पिता ने कितना कुछ खोया होगा व कितना खोएगा... अपना आँगन उजाड़ कर दूसरे के आंगन को महकाना कोई छोटी बात नहीं है। खाने और व्यवस्था में कमियां न निकाले... । बेटी की शादी में बनने वाले पनीर, रोटी या मिठाई या पकवा पकने में उतना समय लगता है जितनी लड़की की उम्र होती है। यह भोजन सिर्फ भोजन नहीं, पिता के अरमान व जीवन का सपना होता है। बेटी की शादी में बनने वाले पकवानों में स्वाद क‌ई सपनों के कुचलने के बाद आता है व उन्हें पकने में वर्षों लगते है, बेटी की शादी में खाने और व्यवस्था की हमें कद्र करना चाहिए। हम सब कोशिश करें एक कदम बेटियों के सम्मान के लिए उठाने हेतु।।
एक बेटी अपने पिता के लिए क्या मायने रखती है यह वही समझ सकता है जिसके पास बेटी होगी||
अगर बेटी की शादी एक अच्छे इंसान से हो जाय तो बेटी के मां बाप को एक बेटा मिल जाता है।।

किसी ने सोना, किसी ने चांदी , 
किसी ने सारी दौलत ही दे दी।।
किसी ने किसी का घर बसाने के लिए,
अपने घर की रौनक ही दे दी।।

                                                 - प्रदीप कुमार पाण्डेय